प्रस्तावित परिसीमन के विरोध में राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में रविवार 30 अगस्त को आदिवासी एकता महाजुटान रैली का आयोजन किया गया। पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के नेतृत्व में आयोजित इस महाजुटान में झारखंड के विभिन्न जिलों से करीब एक लाख आदिवासी समाज के लोगों के पहुंचने का दावा किया जा रहा है।
रैली में आदिवासी समाज के महिला, पुरुष, बुजुर्ग और युवाओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। कई लोग पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे, वहीं कई समूह ढोल-नगाड़ों के साथ मोरहाबादी मैदान पहुंचे।
इस महाजुटान में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन वह खुद कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। उनकी ओर से झामुमो विधायक विकास कुमार मुंडा प्रतिनिधि के तौर पर कार्यक्रम में पहुंचे।
मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी के बीच उनके प्रतिनिधि के तौर पर विकास मुंडा का महाजुटान में पहुंचना राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। महाजुटान का मुख्य मुद्दा आदिवासी हितों से जुड़े सवालों के साथ-साथ प्रस्तावित परिसीमन का विरोध रहा। ऐसे में मुख्यमंत्री की ओर से प्रतिनिधि भेजे जाने को आदिवासी समाज के इस बड़े आयोजन के प्रति सरकार की मौजूदगी के तौर पर देखा जा रहा है।
मोरहाबादी मैदान में मंच संचालन से पहले झारखंड के वीर शहीदों के चित्र माल्यार्पण किया गया इसके लिए प्रवेश द्वार के सामने 22 कट आउट लगाए गए थे। इसमें भगवान बिरसा मुंडा, गंगा नारायण सिंह, नीलांबर-पीतांबर, फूलो झानो, रामदयाल मुंडा समेत अन्य वीर क्रांतिकारी शामिल है। महाजुटान को लेकर कई संगठनों के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता जुटे।
इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने कहा कि भाजपा और आरएसएस झारखंड पर कब्जा करना चाहते हैं। झारखंड में देश की करीब 40 प्रतिशत खनिज संपदा है। भाजपा को देश के बड़े-बड़े उद्योगपति चला रहे हैं। भाजपा को झारखंड में कभी भी घुसने नहीं दिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों में जनसंख्या के आधार पर परिसीमन को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। संविधान में सामाजिक और आर्थिक रूप से सम्मानजनक जीवन जीने की गारंटी दी गई है। इसके बावजूद यहां के आदिवासियों को पलायन के लिए मजबूर किया गया है। आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक भागीदारी नहीं दी जा रही है।
उन्होंने कहा कि संविधान की पांचवीं अनुसूची इसलिए बनाई गई है, क्योंकि आदिवासियों के पूर्वजों ने ब्रिटिश हुकूमत को स्वीकार नहीं किया था। एचईसी और हटिया को जनरल कर दिया गया है। जमशेदपुर में 24 गांवों को विस्थापित कर दिया गया। 2011 की जनगणना में आदिवासियों की आबादी 95 प्रतिशत थी।
आदिवासी महाजुटान रैली में हैदराबाद से आए बेला प्रसाद ने कहा कि मोदी सराकर ने अगर आदिवासियों का हक अधिकार छीना तो तेज आंदोलन होगा। देश में लूट का राज नहीं चलेगा।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुबोधकांत सहाय ने कहा कि एमएमआरडी कानून बना दिया गया है। अभी पेसा कानून लागू हुआ है। यह झारखंड के आदिवासियों का अधिकार है। इलाके में खनिज संपदा है, तो उस पर पहला अधिकार आदिवासियों का ही है। झारखंड के अस्तित्व और अधिकारों की यह लड़ाई लंबी लड़नी होगी।
आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में कांग्रेस नेता बंधु तिर्की ने परिसीमन समेत आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर केंद्र सरकार और भाजपा पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि परिसीमन केवल लोकसभा और विधानसभा की सीटों का सवाल नहीं है, बल्कि यह आदिवासियों के राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है।
सभा के दौरान परिसीमन को लेकर तैयार की गई एक रिपोर्ट भी मंच से प्रस्तुत की गई। बंधु तिर्की ने हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुशीष सोरेन से यह रिपोर्ट मंच पर सौंपने को कहा। उन्होंने बताया कि रिपोर्ट को झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू के माध्यम से कांग्रेस नेता राहुल गांधी तक पहुंचाया जाएगा, ताकि आदिवासी समाज की चिंताओं को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाया जा सके।
बंधु तिर्की ने कहा कि यदि जनसंख्या को आधार बनाकर परिसीमन में झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कम करने का प्रयास किया गया तो इसे कतई स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपने राजनीतिक अधिकारों और संविधान से मिले अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने को तैयार है।
सभा में उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल लोकसभा और विधानसभा को बचाने की नहीं है। इस राज्य में बहुत बड़ा षड्यंत्र रचा जा रहा है। उन्होंने आरएसएस और भाजपा पर झारखंड की पहचान बदलने की कोशिश करने का आरोप लगाते हुए कहा कि झारखंड भगवान बिरसा मुंडा, वीर बुधु भगत, सिदो-कान्हू और फूलो-झानो की धरती है।
बंधु तिर्की ने धर्म के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति का विरोध करते हुए कहा कि झारखंड के गांवों में अलग-अलग जाति और समुदाय के लोग वर्षों से मिल-जुलकर रहते आए हैं और सोशल मीडिया के जरिए फैलाए जा रहे भ्रामक एवं आपत्तिजनक संदेशों से लोगों को सावधान रहना होगा।
उन्होंने आदिवासी आबादी में गिरावट और पलायन को गंभीर चिंता का विषय बताया। खासकर पहाड़िया समुदाय का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आबादी में कमी और बड़े पैमाने पर पलायन के पीछे रोजगार, विस्थापन और विकास की नीतियों से जुड़े सवालों पर गंभीरता से विचार करना होगा।
बंधु तिर्की ने खन-खनिज संशोधन विधेयक 2026 को लेकर भी केंद्र सरकार पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के कानूनों से झारखंड के खनिज संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार कमजोर होंगे।
उन्होंने रॉयल्टी और राज्य के बकाये का मुद्दा उठाते हुए कहा कि झारखंड की 1 लाख 36 हजार करोड़ रुपए केंद्र सरकार पर बकाया है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार आदिवासी और झारखंड के हितों के खिलाफ फैसले वापस नहीं लेती है तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जब तक यह कानून वापस नहीं लिया जाएगा, तब तक लड़ाई जारी रहेगी।
उन्होंने कहा कि मोरहाबादी मैदान में उमड़ी भीड़ इस बात का संकेत है कि आदिवासी समाज अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि झारखंड के कोने-कोने से लोग अपनी जमीन, पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए यहां पहुंचे हैं।
बंधु तिर्की ने अंत में कहा कि झारखंड की अस्मिता और आदिवासियों के हक-अधिकार की रक्षा के लिए इस संघर्ष को गांव-गांव तक ले जाना होगा।
परिसीमन के मुद्दे को लेकर आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। सभा में बताया गया कि परिसीमन को लेकर गठित कमेटी ने विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें आदिवासी समाज के राजनीतिक एवं संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी चिंताओं को शामिल किया गया है।
बंधु तिर्की ने हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुशीष सोरेन को बुलाकर रिपोर्ट प्रस्तुत कराई गई और उन्हें सम्मानित किया गया। इस दौरान आयोजकों ने अधिवक्ता सुशीष सोरेन के प्रयासों के लिए सभा में मौजूद लोगों से तालियां बजाकर उनका स्वागत करने की अपील की।
सभा में बताया गया कि यह रिपोर्ट कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी तक पहुंचाई जाएगी। झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू के माध्यम से रिपोर्ट राहुल गांधी को सौंपने की बात कही गई।
मंच से कहा गया कि परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज के बीच कई तरह की चिंताएं हैं। तैयार की गई रिपोर्ट के माध्यम से इन चिंताओं और संभावित प्रभावों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास किया जाएगा।
आयोजकों ने उम्मीद जताई कि रिपोर्ट राहुल गांधी तक पहुंचने के बाद आने वाले दिनों में परिसीमन से जुड़े मुद्दों पर आदिवासी समाज की चिंताओं को मजबूती से उठाया जा सकेगा।
इस अवसर पर तमाड़ विधायक विकास मुंडा ने कहा कि 2007 में विरोध के बीच सीट बच पायी थीं। आज वही ताकत देश की सत्ता में बैठी है। इस राज्य में पॉलिसी लागू कर टूल बनाकर आदिवासी सीट कम कर सकते हैं। केंद्र सरकार ने वन अधिकार लागू किया। इसके बाद हसदेव जंगल काटे गए। असम में भी परिसीमन लागू किया गया। इस परिसीमन से आदिवासियों को नुक्सान हुआ. वहां बहुसंख्यक थे। सीटों का परिसीमन किए गए और अब असम में अल्पसंख्यक हो गया है।
मध्य प्रदेश से आए आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह एक ऐतिहासिक कार्यक्रम हैं। ये हमारी एकता का है। जो बताता है कि हम कितने ताकतवर हैं। मगर ताकत हो और हम उसका उपयोग नहीं करें तो उसका कोई मतलब नहीं है। यहां पर हम सब लोग आदिवासी हैं।
बीजेपी पे निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि बीजेपी वाले आपको आदिवासी नहीं मानते हैं। बीजेपी वाले वनवासी बोलते हैं। वनवासी मतलब जो जंगलों में ही रहता है।
उन्होंने आगे कहा कि आज अगर हमारे लोग पढ़ लिख कर आगे बढ़ रहे हैं वो सबसे बड़ी ताकत क्या है? आरक्षण को लेकर कहा कि अगर आरक्षण नहीं होता तो हमारे लोग डॉक्टर नहीं बनते। सर्जन नहीं बनते, अधिकारी नहीं बनते। हमको राजनेता के रूप में आगे नहीं आने को मिलता। आप जितने लोग मंच पर बैठे लोगों को देख रहे हो, यह आरक्षण के कारण है। जिस दिन ये हमारा अधिकार छीन गया, तो कोई मतलब का नहीं रहेगा। आपके बच्चे लोग धक्के खाते रहेंगे। पर आपको आपका अधिकार नहीं मिलेगा।
आज जो रैली आई है, यह रैली क्यों कर रहे हैं? यह इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हमारे जो अधिकार है, जितनी सीटें हमें मिलना चाहिए, जो डिलिमिटेशन में कम करने का काम भाजपा के लोग कर रहे हैं, उसके विरोध में आए हैं। पहले भी ये जब सीटें बंटवारा हो रहा था, हमें जितनी सीटें मिलनी थी, वो सीटें ये भाजपा वाले नहीं दे रहे थे।
उन्होंने कहा कि झारखंड जो बना था आप लोगों की ताकत से बना था। आपने लड़ाई लड़ी थी और तब जाकर झारखंड बना था। यह याद रखना होगा बिरसा मुंडा जी ने उल गुलान का नारा दिया था। एक तब का दिन था और एक आज का दिन है। आज भी हम लड़ाई लड़ रहे हैं। यह उल गुलान की दूसरी लड़ाई है।
खिजरी विधायक राजेश कच्छप ने कहा कि आदिवासी समाज उसी का जिंदाबाद करेगा जो आदिवासियों की बात करेगा। देश का पहला नागरिक आदिवासी हैं। परिसीमन के बारे में आदिवासियों को लड़ने के लिए राजनीतिक सीट दिए गए।
खूंटी लोकसभा सांसद कालीचरण मुंडा ने परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज को एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि उनके पूर्वजों ने देश और राज्य के लिए संघर्ष किया था और अब नई परिस्थितियों में समाज को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ाई लड़नी होगी।
कालीचरण मुंडा ने कहा कि यह देश आदिवासियों का भी है और हमारे पूर्वजों ने देश के लिए लड़ाई लड़ी है। हमें भी अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़नी होगी।
उन्होंने आरोप लगाया कि परिसीमन के माध्यम से आदिवासी समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी और विधानसभा-लोकसभा क्षेत्रों पर असर डालने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की जो सीटें और क्षेत्र वर्तमान में हैं, उनमें कमी नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़नी चाहिए।
सांसद ने कहा कि परिसीमन के विरोध में जहां-जहां बैठकें और कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं, वहां समाज के लोगों को एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए। उन्होंने झारखंड के सभी आदिवासी भाई-बहनों से इस मुद्दे पर एकजुट होने और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने की अपील की।
कालीचरण मुंडा ने कहा कि आदिवासी समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी कम करने के किसी भी प्रयास का विरोध किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल किसी एक क्षेत्र या समुदाय की नहीं, बल्कि झारखंड में आदिवासी अधिकार और राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।
प्रदीप बालमुचू ने कहा कि आदिवासियों की सीट लोकसभा और विधानसभा की सीट घटाई जा रही है। जनसंख्या के आधार पर डेलीमिनेशन होता गया तो, धीरे-धीरे रिजर्वेशन कम हो जाएगा। एक दिन ऐसा आएगा कि आदिवासियों की जनसंख्या कम हो जाएगी। 25 साल की झारखंड में सत्ता और राज कायम करने के लिए रैली करना पड़ रहा है। आज रैली के माध्यम से बीजेपी और दिल्ली को बताने का काम करेंगे। आदिवासियों की 81 में 28 सीट आरक्षित है। 22 प्रतिशत होगी तभी राजनीतिक में भागीदारी हो सकती है।
कांग्रेस नेता केशव महतो कमलेश ने कहा कि झारखंड की धरती हमेशा से उलगुलान और संघर्ष की धरती रही है। यहां के आदिवासी समाज ने अपने जल, जंगल और जमीन के साथ-साथ अधिकारों के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया है।
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर, जयपाल सिंह मुंडा और देवेन्द्र नाथ समद ने संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आदिवासी समाज के अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण देने का काम किया गया।
महतो ने आरोप लगाया कि आज भाजपा के नेता आदिवासियों को संविधान से मिले अधिकारों से वंचित करने का प्रयास कर रहे हैं। आदिवासी समाज के हक और अधिकारों पर किसी भी तरह की हकमारी कांग्रेस पार्टी बर्दाश्त नहीं करेगी।
उन्होंने कहा कि संविधान में आदिवासी समाज के अधिकारों और उनके संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। इन्हीं संवैधानिक अधिकारों की बदौलत आदिवासी समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अपने क्षेत्रों की विशिष्ट पहचान का संरक्षण मिला है। ऐसे में परिसीमन या किसी अन्य प्रक्रिया के नाम पर आदिवासी समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी कम करने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती।
केशव महतो कमलेश ने कहा कि कांग्रेस पार्टी शुरू से ही आदिवासी समाज के हक, अधिकार और सम्मान की लड़ाई लड़ती रही है और आगे भी मजबूती से यह लड़ाई जारी रखेगी। उन्होंने कहा कि झारखंड के आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए पार्टी हर स्तर पर आवाज उठाएगी।
झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर चिंता जताई गई है। मांग की गई है कि परिसीमन के दौरान लोकसभा और विधानसभा में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में किसी भी प्रकार की कमी स्वीकार नहीं की जाए।
आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने मांग की कि यदि परिसीमन के बाद लोकसभा और विधानसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ती है, तो एसटी के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ाई जानी चाहिए। इससे आबादी और निर्वाचन क्षेत्रों में होने वाले बदलाव के बावजूद आदिवासी समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा।
मांग में कहा गया है कि झारखंड के परिसीमन को केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। राज्य की विशेष सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों को भी परिसीमन का आधार बनाया जाए। इसके तहत पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र, आदिवासी बहुल इलाके, ऐतिहासिक विस्थापन और पलायन जैसे मुद्दों को भी ध्यान में रखने की जरूरत बताई गई है।
समर्थकों ने कहा कि झारखंड की आदिवासी आबादी का राजनीतिक प्रतिनिधित्व राज्य की सामाजिक संरचना और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा विषय है। इसलिए परिसीमन की प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सीटों के पुनर्गठन से आदिवासी समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी पर प्रतिकूल असर न पड़े।
अवसर पर शिल्पी नेहा तिर्की ने जयपाल सिंह मुंडा के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा द्वारा आदिवासी समाज के अधिकारों को लेकर उठाए गए सवालों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस समाज को इतिहास में कभी उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला, आज उसी की संख्या के आधार पर उसकी राजनीतिक आवाज और प्रतिनिधित्व तय करने की कोशिश स्वीकार नहीं की जाएगी।
उन्होंने कहा कि झारखंड बनने के बाद दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में लोग नौकरी और रोजगार के लिए यहां आए। समय के साथ कई लोग परिवार के साथ यहां बस गए और जमीन लेकर घर भी बनाए। उन्होंने कहा कि आज गांवों और शहरों में जाकर यह देखना होगा कि स्थानीय लोगों के बीच किस तरह जनसांख्यिकीय बदलाव हुआ है।
कोलेबिरा विधायक विल्सन कोनगाड़ी ने आदिवासी महाजुटान को संबोधित करते हुए कहा कि आदिवासी समाज शुरू से ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता आ रहा है। संघर्ष और गुलामी के दौर में भी आदिवासी समाज ने सामूहिक एकता और ताकत के बल पर अपने अधिकारों की रक्षा की।
उन्होंने कहा कि पूर्वजों के संघर्ष और बलिदान के कारण ही आदिवासी समाज को संविधान में विशेष अधिकार और कानून मिले हैं। इन्हीं अधिकारों के कारण आज आदिवासी समाज ने देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है।
एमएमडीआर एक्ट में संशोधन और वन संरक्षण कानून जैसे प्रावधानों के माध्यम से आदिवासियों के अधिकारों को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने भाजपा और आरएसएस पर आदिवासी समाज को परेशान करने और उसके अधिकारों को कमजोर करने का आरोप लगाया।
परिसीमन को लेकर रांची में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में पश्चिमी सिंहभूम से भगवान बिरसा मुंडा के अनुयायी भी पहुंचे। बिरसाइयत परिवार और समाज से जुड़े लोगों ने महाजुटान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए परिसीमन के मुद्दे पर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का संदेश दिया।
बिरसा मुंडा के अनुयायी खुद को बिरसाइयत बताते हैं और भगवान बिरसा मुंडा के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। महाजुटान में पहुंचे इन लोगों का पहनावा, रहन-सहन और धार्मिक-सामाजिक परंपराएं भी अलग नजर आईं।
सनद रहे कि पश्चिमी सिंहभूम के देवगांव, बंदगांव, बड़की और बिरबा क्षेत्र से बिरसाइयत समाज के लोग महाजुटान में शामिल होने पहुंचे। इनमें कई लोग जंगल और पहाड़ी इलाकों में बसे दूर-दराज के क्षेत्रों में रहते हैं, जहां सामान्य बस्तियों की तरह पहुंचना भी आसान नहीं है।
आदिवासी एकता महाजुटान कार्यक्रम में लोहरदगा लोकसभा सांसद सुखदेव भगत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी का संदेश पढ़कर सुनाया। राहुल गांधी ने कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाने पर खेद जताते हुए आदिवासी समाज के अधिकार, पहचान और सम्मान की लड़ाई में साथ खड़े रहने की बात कही।
राहुल गांधी के संदेश में कहा गया कि मुझे खेद है कि मैं रांची में हो रहे कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाया, मगर अपने अधिकारों, पहचान और सम्मान की रक्षा के लिए मैं आप सभी के साथ मजबूती से खड़ा हूं।
संदेश में झारखंड के इतिहास और आदिवासी समाज के संघर्ष का उल्लेख करते हुए जयपाल सिंह मुंडा को याद किया गया। राहुल गांधी ने कहा कि जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में आदिवासी समाज की आवाज बुलंद की और उनके अधिकारों को संवैधानिक सुरक्षा दिलाने के लिए संघर्ष किया।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लिए आदिवासी अधिकार सर्वोपरि हैं। संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून और वन अधिकार कानून इसी सोच पर आधारित हैं कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा करने वाले समुदायों को अपने संसाधनों पर सबसे मजबूत आवाज मिले। राहुल गांधी ने विकास को लेकर भी संदेश दिया कि विकास का मतलब विस्थापन नहीं, बल्कि लोगों की भागीदारी, सहमति और सम्मान के साथ प्रगति होना चाहिए। झारखंड के संसाधनों पर यहां के लोगों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत है।
संदेश के अंत में राहुल गांधी ने कहा कि जल, जंगल और जमीन की लड़ाई केवल संसाधनों की लड़ाई नहीं, बल्कि सम्मान, अस्मिता और अधिकार की लड़ाई है। उन्होंने अपने संदेश का समापन “जय जोहार” के साथ किया।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)